सोमवार, 30 सितंबर 2013

म.प्र.लेखक संघ 'हिन्दी पर केनिद्रत 176वीं गोष्ठी हुर्इ

पंजीयन क्रंमाक-1995 दिनांक 8.12.70
    
मध्यप्रदेश लेखक संघ जिला इकार्इ टीकमगढ़ (म.प्र.)
कार्यालय-22547 नर्इ चर्च के पीछे,शिवनगर कालोनी,कुँवरपुरा रोड़,टीकमगढ़,मोबाइल-9893520965
अध्यक्ष-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी(मोबा.9893520965)    सचिव-रामगोपाल रैकवार (मोबा.8085153778)
म.प्र.लेखक संघ 'हिन्दी पर केनिद्रत 176वीं गोष्ठी हुर्इ-
                          (म.प्र.लेखक की 176वीं गोष्ठी)
  टीकमगढ़ नगर की ख्यातिप्राप्त सुप्रसिद्ध साहितियक संस्था म.प्र.लेखक की 176वीं गोष्ठी राजभाषा'हिन्दी पर केनिद्रत जिला पुस्तकालय में आयोजित की गयी जिसकी अध्यक्षता ख्यातिप्राप्त साहित्यकार प.ंहरिविष्णु अवस्थी ने की तथा मुख्य अतिथि दतिया के कवि डा. राजेन्द्र सिंह खेंगर व विशिष्ट अतिथि अवधबिहारी श्रीवास्तव रहे। प्रथम दौर में बी.एल.जैन,हरेन्द्रपाल सिंह,आर.एस.शमा,पं.हरिविष्णु अवस्थी,देवेन्द्र अहिरवार(दिगौड़ा) ने हिन्दी पर अपने विचार रखे।
दूसरे दौर में कवि गोष्ठी का शुभारंभ पूरन चन्द्र गुप्ता ने सरस्वती की वंदना से किया-
वीणा वीणावादिनी माँ शारदे वर दे वीणावादिनी।
ग्राम नदनवारा से पधारे गीतकार शोभाराम दांगी 'इन्दु ने सुनाया-
                                     आओ भइया तुम्हें सिखायें हिन्दी हिन्दुस्तान की।
                                     अग्रेंजों की भाषा छोडो सीखों हिन्दुस्तान की।।
रामेश्वर राय 'परदेशी ने गीत पढ़ा- हिन्दी नहीं हिन्दुओं की ये भाषा हिन्दुस्तान की।
                       है धोतक सदभाव एकता भारत के सम्मान की।।
म.प्र. लेखक संघ के जिलाध्यक्ष राजीव नामदेव 'राना लिधौरी ने 'हिन्दी पर कविता पढ़ी-   
            हम 'अंग्रेजी तारीख में 'हिन्दी दिवस मनाते है,
             और हिन्दी हिन्दी का शोर मचाते है
            और घर आकर सब भूल जाते है।
मुख्य अतिथि दतिया शहर से पधारे डा. राजेन्द्र सिंह खेंगर ने ग़ज़ल सुनायी-
                                                  कुत्ते से डर जाये वो हाथी नहीं होते।
                                             आपतित में भाग जाये वो साथी नहीं होते।।
नवोदित कवि रिजवान खान रचना पढ़ी-     गफ़लतों के  साये में वो बहाना तलाश करता है।
                                                              वह सुर के नए अंदाज़ में तराना तलाश करता है।।
अमिताभ गोस्वामी ने पढ़ा-हम जानवरों को भले ही दे हिन्दी की सौगात।
                                    पर खुद तो ले हिन्दी को आत्मसात।।
परमेश्वरीदास तिवारी हास्य कविता सुनायी- मैंने कहा पंडि़त जी कल मेरे निवास पर पधारिये।
                        मेरे पिता का श्राद्ध है,वही भोजन कीजिए। पंडि़त जी बोले पहले मीनू बताइये।
सियाराम अहिरवार ने कविता सुनायी-    जिसकी अभिव्यकित में सौदर्य का बोध होता है।
 जिसके शब्द भण्डार का निरन्तर शोध होता है वो हिन्दी है।
ग्राम लखौरा से पधारे कवि गुलाब सिंह यादव 'भाऊ-भगवान तुमने जौ का करो,
                                                            उर्दा नइ फरो,किसान खो कजऱ् धरौ।।
शांतिकुमार जैन 'प्रियदर्शी-सघन वन और ये अंधेरे,मूक निमंत्रण छलता है।
                                      अभी कहाँ विश्राम हुआ है मीलो दूर चलना है।
    कवि भान सिंह बुन्देली में रचना पढ़ी-    प्यारी लगत नाक में बारी-बारी डरी खारी।
गीतकार प्रसन्न जैन 'माँ केनिद्रत गीत पढा़ तथा विजय मेहरा ने उसकी 'शादी हो गयी व्यंग्य रचना पढ़ी।
इनके आलावा अवध विहारी श्रीवास्तव, खेमराज माझी, हाज़ी ज़फ़रउल्ला खां 'ज़फ़र, हाजी अनवार वीरेन्द्र चंसौरिया,लालजी सहाय श्रीवास्तव,कमलेश राय,सुश्रुत तिवारी आदि ने भी अपने विचार रखे। गोष्ठी का संचालन अजीत श्रीवास्तव ने किया एवं सभी का आभार प्रदर्शन रामगोपाल रैकवार 'कँवल ने किया।                                            
                                    रपट- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
                ,                अध्यक्ष म.प्र.लेखक संघ,टीकमगढ़,मोबाइल-9893520965,               

शनिवार, 14 सितंबर 2013

राना लिधौरी के हिन्दी पर हायकू

राना लिधौरी के हिन्दी पर हायकू
 राना लिधौरी के हिन्दी पर हायकू

राना लिधौरी के

हिन्दी पर हायकू

    1
हिन्दी सहेली,
अंग्रेजी अलबेली।
उदर्ू पहेली।।
    2
भाषा सुहानी,
भारत की है शान।
हिन्दी है रानी।।
    3
ज्ञान बढ़ाएँ,
वे होती लाजबाब।
पढ़ें किताब।।
    4
ज्ञान सरिता,
जो सबको दिशा दे।
वही कविता।।
    5
करो गंभीर,
चिंतन औ मनन।
फिर सृजन।।

 -राजीव नामदेव ''राना लिधौरी,टीकमगढ़,(म.प्र.)
संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र..लेखक संघ
नर्इ चर्च के पीछे,शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (म.प्र.) पिन कोड-472001
मोबाइल न.-9893520965

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हिन्दी दिवस पर कविता--हिन्दी में हम-राजीव नामदेव ''राना लिधौरी,

हिन्दी दिवस पर हिन्दी कविता- हिन्दी में हम
 हिन्दी दिवस पर हिन्दी कविता

 हिन्दी दिवस पर हिन्दी कविता-

'हिन्दी में हम
हिन्दी में दम,
ऊदर्ू हमदम।
ये अंग्रेजी,
विदेशी रम।
काम कीजिए,
हिन्दी में हरदम।
सदा कीजिए,
दान व धर्म।
र्इश्वर ध्यान,
मिटेंगे ग़म।

पुस्तक पढ़ों,
दूर हो तम।
गर्व से कहो,
हिन्दू है हम।
'हिन्दी में हम।।
000
-राजीव नामदेव ''राना लिधौरी,टीकमगढ़,(म.प्र.)
संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र..लेखक संघ
नर्इ चर्च के पीछे,शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (म.प्र.) पिन कोड-472001
मोबाइल न.-9893520965

हिन्दी दिवस पर विशेष कविता-राजभाषा हिन्दी का हाल--राजीव नामदेव ''राना लिधौरी''

हिन्दी दिवस पर विशेष कविता-
हिन्दी दिवस पर-
कविता :-'राजभाषा हिन्दी का हाल '

राजभाषा हिन्दी का ये हाल देखिए,
अंगे्रजी ने कैसे कर दिया फटेहाल देखिए।
कहने को तो हमारी राजभाषा हिन्दी ही है,
लेकिन अंग्रजी ने उसे लगा दी अब बिन्दी है।
जहाँ देखो अंग्रेजी में हर काम काज होता है,
बिना अंग्रेजी बोले तो किसी पे आज रौब नहीं जमता है।
स्कूल, कालेज, आफिस जहाँ पर भी देखिए,
हर तरफ अंग्रेजी का बढ़ता चलन
और हिन्दी का बुरा हाल देखिए।
हम कैसे मान ले कि,हिन्दी ही हमारी राजभाषा है
रोज़ उसका हो रहा पतन और नाश है।
हम लोगों को  कैसे समझए कि अभी भी,
हिन्दी ही हमारे देश की राजभाषा है।
राजभाषा में ही आप बोलिए
उसका अपमान तो मत कीजिए।
कुछ तो उस पर रहम कीजिए ।
अंगे्रजी से बिलकुल नाता ही तोड़ दीजिए,
नहीं तो एक दिन राजभाषा हिन्दी खो जाएगी
फिर किसी को भी उसकी याद तक न आएगी।
हम'अंग्रेजी तारीख़् में 'हिन्दी दिवस मनाते है।
बस एक दिन हर साल हिन्दी दिवस पर ही
हिन्दी-हिन्दी का शोर मचाते है।
और घर आकर सब भूल जाते है।।     
       000       

- राजीव नामदेव ''राना लिधौरी''

 संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
अध्यक्ष-म.प्र..लेखक संघ
नर्इ चर्च के पीछे,शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (म.प्र.) पिन कोड-472001
मोबाइल न.-9893520965
E Mail- ranalidhori@gmail.com 

Bloggs- rajeev namdeo rana lidhori. Blogspot.in



बुधवार, 4 सितंबर 2013

Teacher's Day

Teacher's Day

Happy Teacher's Day

बुन्देली कविता-''जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते
जो हम कऊ शिक्षाकर्मी बन जाते..
घर में परे-परे ही खाते ।
किराये कौ टीचर उते रखकैं,
सबरी तनख्याह पाते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..

गाँव में है नौकरी हमार्इ,
शहर में ओडी लगवाते।
और सात दिना के दस्तखत,
एक दिना उतै जाकै कर आते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..

जिदना उतै बाजार भरत है,
उदना ही बस जाते।
झोला भर-भर मुफ्त में,
मौंड़न से सब्जी मँगवाते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..

गाँवन में तो घी-दूध
एनर्इ होत है,
त्यौहारन में सब माेंड़न से
तनक - मनक तो मँगवाते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..
वेतन कभऊं न कट पाये,
ऐसी साँठ-गाँठ कर आते।
जींस पैर कै फटफटिया पै,
स्कूल घूमन जाते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..

ठाट बाट से ब्याह रचाते,
हम फोर व्हीलर पाते।
नोटाे की गडडी करकरी एनर्इ आती,
हीरा सी बऊ घर लाते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..

किस्मत खराब है हमार्इ,
जो हम प्राइवेट इस्कूल में पढ़ाते।
इतेक तनक वेतन में तो हम,
मकान कौ किराओं नर्इ चुका पाते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..

शासन ने लटका दऔ हम खौं,
नर्इतर हमर्इ कऊं लग जाते।
जो हम शिक्षाकर्मी बन जाते..
    000
 राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
   संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
   अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
  शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़(म.प्र.)
    भारत,पिन:472001 मोबाइल-9893520965

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

viyang teachers day-Rajeev namdeo "Rana Lidhori"

viyang teachers day-Rajeev namdeo "Rana Lidhori"                              व्यंग्य-''शिक्षक बेचारा काम का मारा
                                                          (राजीव नामदेव 'राना लिधौरी)
       
            शिक्षक इस दुनिया में सबसे अजीबोगरीब इंसान है वह बहुत ही बेबस,लाचार,दयनीय भी होता है। वह कक्षा में बच्चों के द्वारा पूछे गये प्रश्नों की बौछार खाता है घर में बीबी से ताने और फटकार खाता है। दुकानदार से उधारी में सामान न पाने की घुड़की खाता है ये बात अलग है कि वह उसे प्यार से पुटिया लेता है और अपना उल्लू सीधा कर लेता है और स्कूल के लंच में मध्ययान भोजन में मुफ़्त में पतली दाल में कंकड़ खाता है जो उसे दाल होने का भ्रम पैदा करती है तथा डठूला लगी रोटी खाता है ताकि खाने वाले को किसी की नजर न लगे या हम कह सकते है कि चाँद सी रोटी खाता है जिसमें कर्इ दाग होते है जो कहीं -कही पर गीले (कच्चा) होते है जो कि हमें चाँद पे पानी (जीवन) होने की अहसास दिलाते है।
            लेकिन इन सबसे बदले में शिक्षक स्कूल में चपरासी से लेकर बाबू व हेड मास्टर तक के सभी पदों पर एक ही वेतन में काम करता है यह बात और है कि उसे बच्चों को स्कूल में पढ़ाने का समय ही नहीं मिल पाता। स्कूल तो स्कूल, वह तो गाँव में जनगणना,जातिगणना,पशु गणना,मकान गणना चुनाव में वोट गणना आदि का कार्य भी बखूबी निभाता है। या हम कह सकते है कि शिक्षक एक बिना सींग की दूधारू गाय है, जिसे शासन जब चाहे दुहता रहता है बदले कभी कभी साल में एक बार थोडी सी वेतन वृद्वि इंक्रीमेंट या मंहगार्इ भत्ता का हरा चारा खिलाता रहता है। ताकि ये सभी शिक्षक ज्यादा से ज्यादा दूध (काम) दे सके।
            इस शिक्षक रूपी प्राणी की पहचान पहले सफेद कुर्ता- पजामा या धोती,एक छाता व साइकिल होती थी, लेकिन समय के परिवर्तन के साथ अब कुर्ता पजामा के स्थान पर पेंट शर्ट और कहीं -कहीं पर जींस,टी शर्ट ने ले ली है। छाता तो ओल्ड फैशन हो गया है इसीलिए इसका प्रयोग बहुत ही कम हो गया है। क्योंकि बरसात मे कभी-कभी यदि बहुत आवश्यक हुआ तो ही स्कूल जाना पड़ा तो रेनकोट पहन कर चले गये वर्ना जिस दिन बरसात हुर्इ उस दिन रेनी डे मना लिया। साइकिल का स्थान अब मोटर साइकिल ने ले लिया है। झोला अभी भी गाँव के शिक्षकों के कंधे पर दिखार्इ पड़ जाता है जबकि शहर में काले रंग के बैग का उपयोग होने लगा। जो कि स्कूल की फाइले एवं मुफ्त मे मिली सब्जी रखने के बहुत काम आता है। सबिजयाँ बाहर न झाँके क्योंकि इनसे उनके 'किडनेप होने का खतरा बना रहता है। इसलिए बैग में एक चैन लगी होती तथा जिसमें एक छोटा सा ताला भी लगा होता है।
            प्राइवेट शिक्षक वह शिक्षक होता है। जिसकी गन्ने की तरह शासन द्वारा पिरार्इ की जाती है। जिससे उसका वेट कम हो जाता है और जब किसी चीज का वैट कम हो जाता है। तो उसका रेट भी कम हो जाता है और जिसका रेट 'सैट हो जाता है तो वह अनेक वषोर्ं तक उसी स्कूल में सैट हो जाता है और जब वह सैट हो जाता है तो टयूशन करने के कारण स्कूल आने में लेट हो जाता है। यहीं से उसका मटियामेट हो जाता है और फिर एक दिन वह स्कूल के गेट से भैंट हो जाता है अर्थात वह दूसरे स्कूल का गेट खटखटाता है और वहाँ पे पहले से भी कम रेट पर 'सेट हो जाता है।
            यंू तो शिक्षकों के दो मुख्य प्रकार होते है। पहला शासकीय शिक्षक तथा दूसरा प्राइवेट शिक्षक। प्राचीनकाल में शिक्षक एक ही प्रकार के होते थे। जिन्हें हम गुरू कहते थे। अब इनकी दो नस्ले 'गुरूजी व 'शिक्षाकर्मी भी असितत्व में आ चुकी है। इनकी भी उप प्रजातियाँ हैं। प्राइवेट स्कूलों में कम्प्यूटर शिक्षक भी होने लगे है जो शिक्षक कम बाबू का काम अधिक करते है।,डा.,आदि नामों से भी महिमा मंडित किया जाता है। जितने बडे़ पद पर शिक्षक होगा उसका उतना ही अधिक वेतन होगा,लेकिन काम इसके विपरीत उतना ही कम होता जाता है। एक कटु सत्य है कि कालेज में प्रोफेसर,डा. पढ़ाने कम टाइम पास करने एवं गप्पे हाँकने ज्यादा जाते है। जबकि गाँवों के स्कूलों में शिक्षक पढ़ाने कम सब्जी लेने ज्यादा जाते है। वह भी विशेष हफ्ते में एक दिन जिस दिन वहाँ का बाज़ार लगता है।
                प्राचीनकाल में आचार्य 'गुरू जंगल में आश्रम बनाकर मुफ्त में पढ़ाते थे। किन्तु आधुनिक शिक्षक 'टयूशन को मजबूर करके करने उनसे पैसा जबरन बसूल करते है। अपने घर पर बुलाते है और जो 'टयूशन नहीं पढ़ता है उसे कम नम्बर देने तथा फैल करने की धमकी भी देते है। वो तो धन्य है हमारी सरकार जिन्हाेंने कक्षा- 8वीं तक किसी भी छात्र-छात्राओं फेल नहीं करने का आदेश निकाल रखा है अत: बच्चों की कक्षा- 8वीं तक तो नैया पार हो ही जायेगी। कक्षा-9वीें में एक साल किसी तरह टयूशन पढ़ लेगे और फिर कक्षा 10वीं की तो बोर्ड परीक्षा होती है उसमें शिक्षक हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। फेल तो वे कर सकते नहीं, प्रेक्टीकल में पास तो उन्हें करना ही पड़ेगा। और परीक्षा में हम किसी तरह जुगाड़ करके अगल-वगल में तांक झांक करके नकल करके पास तो हो ही जायेंगे।       
                खैर ! धन्य है वे आधुनिक शिक्षक जो आज अपना मूल कार्य शिक्षा धर्म भूलकर अन्य कार्यो में लिप्त रहते है तथा 'ओ डी लगवाकर या आफिस का कोर्इ काम बताकर प्राय: स्कूल से गोल रहते है और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते रहते है। वे तो चालीस हजार रू.वेतन पाते है और काम 420 का करते है।
                अब शासन ने नयी भर्ती के तहत शिक्षक के स्थान पर 'शिक्षाकर्मी रख लिये है वो भी इतने कम वेतन में जो कि पुराने चपरासी तक के वेतन से इतना कम है कि उन्हें किसी को बताने तक में शर्म आती है।ं उन शिक्षाकर्मियों का एक नारा है 'जितना वेतन उतना काम उनका सीधा सा गणित है कि जितना 40000रू.पाने वाला शिक्षक काम करता है उससे दस प्रतिशत कम काम हम करेगे,क्याकि वेतन भी हमे उनका दस प्रतिशत ही मिलता है। अब आप स्वयं अंदाज लगा सकते है कि भारत में एक सरकारी 'पुराना शिक्षक स्कूल में बच्चों को कितना पढ़ार्इ कराते है और कितने दिन र्इमानदारी से स्कूल पढ़ाने जाते है। कुछ शिक्षाकर्मियों ने तो बाकायदा अपने स्थान पर उसी गाँव के लड़कों को किराये (किराये का मास्टर) पर रख लिये हैं उन्हें अपने वेतन में से आधा या कहीं- कहीं पर एक या दो हजार रू मासिक दे कर अपना पूरा वेतन घर बैठे पाते रखते है। आज शिक्षक अपनी गरिमा,मान सम्मान खो बैठा है। पहले लोग एवं सारा गाँव सम्मान की दृषिट से देखता था,तथा उनके पाँव पड़ता था लेकिन आज तो शिक्षकों को पाँव पड़ना तो बहुत दूर की बात है कोर्इ नमस्ते तक नहीं करता,उलते वक़्त पड़ने पर उनके हाथ-पाँव भी तोड़ने से नहीं चूकता। इसी से शिक्षकों के पांव अब स्कूल में नहीं पड़ते।
             
          राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
        संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
       अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
      शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
       पिन:472001 मोबाइल-9893520965