सोमवार, 31 मार्च 2014

काव्य संग्रह 'सीप और मोती' समीक्षा की पढ़ते हुए राजीव नामदेव'राना लिधौरी'

दिनांक—30.3.2014 को श्रीरंगम बी.एड.कालेज,अनंतपुरा,टीकमगढ़ में म.प्र. लेखक संघ जिला इकाई टीकमगढ़ की 'नारी व मातृशक्ति' पर केन्द्रित 182वीं कवि गोष्ठी में डॉ.अनीता अमिताभ गोस्वामी का काव्य संग्रह 'सीप और मोती' प्रथम काव्य संग्रह की समीक्षा पढ़ते हुए म.प्र. लेखक संघ,टीकमगढ़ के अध्यक्ष राजीव नामदेव'राना लिधौरी'।

'नारी व मातृशक्ति' पर केन्द्रित 182वीं कवि गोष्ठी-अपराजिता सम्मान-म.प्र. लेखक संघ जिला इकाई टीकमगढ़

                                          सैफिया खान 'अपराजिता सम्मान' से सम्मानित
दिनांक—30.3.2014 को श्रीरंगम बी.एड.कालेज,अनंतपुरा,टीकमगढ़ में म.प्र. लेखक संघ जिला इकाई टीकमगढ़ की 'नारी व मातृशक्ति' पर केन्द्रित 182वीं कवि गोष्ठी में कैन्सर जैसे असाध्य रोग को अपनी दृढ़ ईच्छा शक्ति से पराजित करने वाली बहादुर बेटी सैफिया खान पुत्री सलीम खान को साहित्यिक संस्था 'म.प्र. लेखक संघ' ने 'अपराजिता सम्मान' से सम्मानित किया जिसमें उनको आकर्षक सम्मान पत्र व सम्मान राशि भैंट की गयी। सम्मानित करते ​हुए अतिथि एवं म.प्र.लेखक संघ के ​जिलाध्यक्ष राजीव नामदेव 'राना लिधौरी',डॉ.अनीता अमिताभ गोस्वामी,मनोरमा शर्मा,पं.हरिविष्णु अवस्थी,डी.पी. खरे,पी.डी.तिवारी एवं अन्य साहित्यकार। इस अवसर पर डॉ.अनीता अमिताभ गोस्वामी का काव्य संग्रह 'सीप और मोती' का विमोचन किया गया। पुस्तक की समीक्षा राजीव नामदेव'राना लिधौरी'ने पढ़ी। गोष्ठी का संचालन वीरेन्द्र चसौंरिया ने किया तथा सभी का आभार प्रदर्शन मनोहरलाल गोस्वामी ने किया।




'नारी व मातृशक्ति' पर केन्द्रित 182वीं कवि गोष्ठी-अपराजिता सम्मान-म.प्र. लेखक संघ जिला इकाई टीकमगढ़ 182वीं कवि गोष्ठी                               'नारी व मातृशक्ति' पर केन्द्रित 182वीं कवि गोष्ठी 
दिनांक—30.3.2014 को श्रीरंगम बी.एड.कालेज,अनंतपुरा,टीकमगढ़ में म.प्र. लेखक संघ जिला इकाई टीकमगढ़ की 'नारी व मातृशक्ति' पर केन्द्रित 182वीं कवि गोष्ठी में डॉ.अनीता अमिताभ गोस्वामी का प्रथम काव्य संग्रह 'सीप और मोती' का विमोचन करते हुए म.प्र.लेखक संघ के ​जिलाध्यक्ष राजीव नामदेव 'राना लिधौरी',मनोरमा शर्मा,पं.हरिविष्णु अवस्थी,डॉ.डी.पी. खरे,पी.डी.तिवारी एवं अन्य साहित्यकार। 'सीप और मोती' पुस्तक की समीक्षा राजीव नामदेव'राना लिधौरी'ने पढ़ी। गोष्ठी का संचालन वीरेन्द्र चसौंरिया ने किया तथा सभी का आभार प्रदर्शन मनेहरलाल गोस्वामी ने किया।


शुक्रवार, 28 मार्च 2014

राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'टीकमगढ़ (म.प्र.)

 दिनांक 14 मार्च 2014 भिवानी(हरियाणा) में
- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी'टीकमगढ़ (म.प्र.)
 के हिन्दी हायकू संग्रह 'रजनीगंधा'को मिला  प्रशस्ति—पत्र

मंगलवार, 11 मार्च 2014

राजीव नामदेव 'राना लिधौरी व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान

व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान राजीव नामदेव 'राना लिधौरी व्यंग्य- ''नेता कलयुगी भगवान
                               ( राजीव नामदेव 'राना लिधौरी)

                                   
                                           
                आज भारत में नेता धरती के 'कलयुगी भगवान बन गये है या चमचों द्वारा बना दिये गये है, बात एक ही हैं. यह कलयुगी भगवान अपने सभी अच्छे-बुरे काम पैसों की दम पर कर-करा लेतेदेते 
हैं.और जो कुछ विशेष काम पैसों की दम पर नहीं होते, उन्हें वे अपने पाले गये चमचों एवं गुण्ड़ों आदि से कुछ अन्य विशेष प्रकार के तरीकों से करा लेते देते हैं. ये कलयुगी भगवान धन एवं अपने चमचों की अधिक संख्या (बहुमत) के प्रभाव से 'इन्द्रासन की तरह 'कुर्सासन को पाने के लिए सभी प्रकार के दाँव-पेंच अपनाते है एवं अंतत: 'कुर्सासन पाकर या हथियाकर ही दम लेते  हैं.
                अपने नेता काल को जो लगभग पाँच साल का होता है जिससे सिद्ध भी होता  हैं नेता काल है, जिसमें किये गये हज़ार झूठे वायदों में से दो-तीन जो धोखे से या र्इश कृपा से पूरे हो जाते है या किसी अन्य के द्वारा पूरे कर दिये जाते है लेकिन वह इसका श्रेय अपने ऊपर लेने से नहीं चूकते हैं. आगामी चुनाव के समय ये इन कथित कामों का जिक्र इतना बढ़ा-चढ़ाकर करते है अपनी स्वप्रशंसा करने के मौके कभी भी नहीं चूकते चमचों द्वारा भी करवाते रहते है.  गाँवों की मासूम जनता पर इसका असर शीघ्र पड़ जाता है वह उसे सच ही मान लेती है कहा भी गया है कि यदि 'सौ बार झूठ बोलों तो वह सच मान लिया जाता है. इन्हीं की दम पर वह पाँच साल बाद पुन: आगामी चुनाव में 'कुर्सासन पाने के लिए प्रयासरत रहते हैं. जो कार्य प्रारंभ करते  हैं. उन्हें अधूरा जानबूझकर छोड़कर आगामी काल में पूर्ण करने हेतु वोट माँगते हैं,
                ये कलयुगी भगवान काम तो 'रावण का करते है, किन्तु समझते है या प्रदर्शित करते है अपने आप को भगवान 'राम के समान. भाली भाली जनता को गुमराह करके झूठे वायदे एवं लालच देकर चुनाव के समय उन्हें खुश करने के लिए और अपना उल्लू सीधा करने के लिए अर्थात वोट झटकने के लिए वे उन्हे कुछ विशेष प्रकार के प्रसाद देते भी देते हैं,  प्रसाद उनकी हैसियत के हिसाब से या घर में उनके वोटरों की संख्या के आधार पर दिया जाता है. कुछ प्रमुख शैतानी प्रसाद तो चुनाव के समय लगभग सभी को आसानी से प्राप्त हो जाते है जैसे-कंबल,शराब एवं पैसा आदि. कुछ नेता अपने घर में या कार्यालय में ही भंडारा एवं मधुशाला खेल लेते  हैं,  ये खुली हुर्इ अवैध मधुशालाएँ आबकारी विभाग, पुलिस विभाग, चुनाव विभाग के अधिकारियों को दिखार्इ नहीं देती, क्योंकि उनकी आँखों में रिश्वत की पटटी बाँध दी जाती हैं या उस काल के प्रभाव से उनकी नज़र जाती रहती हैं.
                एक बार के एक चुनाव में दक्षिण भारत के एक कलयुगी भगवान ने वोटरों को रिझाने के लिए एक गाँव में प्रत्येक घर में एक-एक टी. व्ही. तक मुक्त में बाँट दी थीं. वर्तमान में सिम, मोबाइल,घड़ी, टयूबवैल, कर्जे का भुगतान भी प्रसाद रूप में बाँट देते हैं, परन्तु मज़े कि बात यह रही कि वे इतना अधिेक प्रसाद देने के बाद भी अपने भक्तों के वोट प्राप्त नहीं कर पाये और चुनाव हार गये.
                नेताओं के वोट माँगने या प्रसाद देने के तरीके भी भिन्न-भिन्न है. जैसे कुछ नेता हाथ-पाँव जोड़ कर या कुछ तोड़कर या तोड़ने की धमकी देकर भी वोट माँगते हैं. तो कुछ नेता कँंबल, भोजन, शराब, साड़ी,चाँदी के बिछियाँ, पायलें सौ, पाँच सौ एवं हज़ार तक के नोट आदि चुनाव के समय बाँटते फिरते दिख जायेगे. भले ही बाद में वे सूद समेत चंदे के रूप में उनसे कर्इ गुने अधिक (चक्रवृद्धि ब्याज) वसूल कर लेते हैं. कुछ बहुत ही चालाक किस्म के कलयुगी भगवान आपके प्रिय जैसे महिलाओं को पति की कसम, आदमी को उनके बेटों की कसमें रखाकर वोट हथियाने की कोशिश करते
हैं, खासकर गाँवों की भोली जनता उनके जाल में जल्दी फँस जाती हैं, और उन्हीं को अपना वोट देकर जिता भी देती हैं, क्योंकि हमारे यहाँ पर झूठी कसमें खाने से जिसकी भी कसम खायी या रखी या दी जाती है, उसको बहुत नुकसान होता है, ऐसा कहा एवं माना जाता है. गाँवों की वोटरी जनता भले ही झूठी कसमें भगवान के डर से न खाये, किन्तु इन्हीं झूठी कसमें खा-खाकर अदालतों में सैंकड़ों लोग अपराधी होते हुए भी छूट जाते हैं, सुना गया है कि अदालत, नेता, बाबू, सरकार, वकीलों एवं दुकानदारों की तो रोजी -रोटी ही इन झूठी कसमों के दम पर ही चलती हैं.
                      कुछ भी हो, लेकिन इन कलयुगी भगवान को, आज वो सभी सुख-सुविधाएँ इस धरती पर मिलती है,जो शायद इन्द्र को स्वर्ग लोक में भी न मिलती हो. ऊपर वाले असली भगवान तो दैत्य,राक्षस आदि से डरते भी
हैं ,लेकिन ये धरती के कलयुगी भगवान किसी से भी नहीं डरते। हाँ, चुनाव के समय जरूर कुछ समय के लिए ये जरूर अपने क्षेत्र के मतदाताओं से डरते है,लेकिन वे इन्हें प्रसन्न करने के विभिन्न तरीके भी जानते हैं. उन्हें अच्छी तरह से पता होता है कि कौन सा भक्त किस प्रकार के प्रसाद से प्रसन्न हो जायेगा और उसे अपने बस में करने का मंत्र उन्हें अच्छी तरह से आता है. वे उस मंत्र को अपने चेलों को अच्छी तरह से समझा एवं सिखा देते है. शिविर,कार्यशाला लगाकर ट्रेण्ड कर देते हैं. वे इस मंत्र का प्रयोग केवल पाँच वर्ष में ही चुनाव आने पर करते हैं और जीत कर या हारकर इन पाँच वर्षो तक वे अपने इन मंत्रों को सिद्ध करने में दुबारा लगे रहते हैं.
                                     राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
                                      संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
                                      अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
                                    शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
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रविवार, 9 मार्च 2014

राजीव नामदेव 'राना लिधौरी-व्यंग्य- 'साहितियक अजगर

                व्यंग्य:- 'साहितियक अजगर
                            (व्यंग्य-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी)
               
                साँपों की सैकड़ों किस्में होती है कुछ बिषधर होते है,तो कुछ अजगर के समान साबूत ही निगलने वाले। साँप अब जंगलों में नहीं रहते,वे अब गाँव शहरों में आदमी के साथ या उसकी आस्तीन में या फिर उनके आस-पास रहना पंसद करते हैं। कहते है कि संगत का असर होता है तभी तो साँपों के गुण आदमी में आने लगे हैं। साँपों को कितना ही दूध पिलाओं वह उगले बिष ही । हर गाँव-शहर में ये साहितियक विषधर और अजगर हैं। बिषधर अपने सामने किसी भी नये एवं छोटे-मोट साहित्यकारों को सदैव आलोचना के जहरीले फन से डसते रहते है। तो अजगर उन्हे पूरा ही निगल जाने की फिराक में सदैव लगे रहते हैं। कुछ साँपों के दाँत जहरीले होने के साथ-साथ बाहर भी निकल आते हैं  तो उनको यह भ्रम हो जाता है कि वे साहितियक हाथी (भारी भरकम,बड़े) हैं या शायद दूसरों को डराने के लिए,किन्तु हम जैसे सपेरे इन बाहरी दिखावटी दाँतों को तोड़ने में बहुत ही कुशल बिशेषज्ञ हो गये है एवं इनको वश में करने का मंत्र जानते है वर्ना इनके कारण नगर में नये साहित्यकार बचते ही कहाँ।
                अपने बाप-दादाओं कि विरासत में मिली प्रसिद्धी का सहारा लेकर ये किसी क्षेत्र विशेष (संस्था) के बिल में कब्जा करके स्वयंभू अध्यक्ष बनकर इठलाते फिरते हैं। भले ही इनका बिल (संस्था) पहली वारिश में ही पानी से भर जाये(दम तोड़ दे)। शायद ऐसी संस्थाओं के अध्यक्षों को  सरकारी अनुदान की ग्लूकोज की बोतल नहीं चढ़ पाती। या फिर किसी नेता द्वारा चंद नोटों के टुकड़े नहीं मिल पाते। ऐसे में वे संस्था को जन्म तो दे देते है,किन्तु उनका भरण पोषण (नियमित संचालन) नहीं कर पाते। ये अपने आपको महाकवि पंत, निराला, प्रेमचन्द आदि की औलाद मानते हैं,जिनके पूर्वज भडैती करके ही अपना जीवन यापन करते रहे उनकी संताने आज श्रेष्ठ साहित्कार होने का दम भरती हैं। अत: नगर में विभिन्न साहितियक संस्थाओं द्वारा आयांजित गोषिठयाँ उन्हें छोटी नज़र आती हैं। बैसे भी इन गोषिठयों में नयी रचनाएँ पढ़ी जाती है अब इस उम्र में इनसे नयी रचनाएँ तो लिखी नहीं  जाती,यानि अंगूर खटटे है वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। ऐसे में यदि नगर की अनेक साहितियक संस्थाएँ इन्हें अपनी साहितियक बिरादरी(गोष्ठी) से अलग कर दे तो कोर्इ आश्चर्य की बात नहीं होगी।
                नगर की कुछ साहितियक संस्थाएँ जहाँ अपनी गोषिठयाँ नियमित हर माह आयोजित करते हुए 150 गोषिठयों के करीब पहँुच गयी है वहीं ये तथाकथिक अजगर अपनी संस्था में अध्यक्ष बनकर कुण्डली मारे बैठे हुए हैं और साल में एक गोष्ठी तक आयोजित नहीं करा पाते,फिर भी इन्हे शर्म तक नहीं आती और इनके कानों में जूँ तक नहीं रेंगती। ओह! मैं तो भूल ही गया था कि साँपों के कान नहीं होते,तभी तो ये इतने बेशरम होते हैं। ऐसे में अपनी गलितयों को छुपाने के लिए दूसरों में कमियाँ ढूँढ़ते फिरते हैं। चूंकि ये दूसरों की टांग खींचने में माहिर होते हैं अत: साहितियक गोषिठयों में इन्हे अब कोर्इ बुलाता नहीं,इसलिए अपनी भड़ास  एवं छपास का बिषगमन ये स्थानीय समाचार पत्रों में समय-समय पर करते रहते हैं यानि कि खिसयार्इ बिल्ली खंभा नोचे।
                बाप-बैटा बराती सास-बहू गौरैया की     कहावत को चरितार्थ करते हुए जहाँ स्वयं को अध्यक्ष घोषित कर देते है वहीं  अपने भार्इ-भतीजों को सचिव बनाने से भी नहीं चूकते।    जिस प्रकार 'नाग पंचमी के दिन साँपों काी पूजा कर उन्हें दूध पिलाया जाता है। कि वे हमें नुकसान न पहँुचाये,ठीक उसी प्रकार नगर के बड़ें आयोजनों में इन विशेष साँपों एवे अजगरों को सम्मानित कर पूजा की जाती है और प्रार्थना की जाती है कि हे बिषधर या अजगरों के राजा हमें अब डसना एवं निगलना छोड़ दो वर्ना कोर्इ भगवान कृष्ण या राजा जनमेजय बनकर आपको समूल ही नष्ट न कर दे। ऐसे में मुझे अपने मित्र का यह शेर याद आ रहा है कि- 

             'नुक़्स गैरों के तुम उंगली पे गिना करते हो।
             'तौलिए खुद को शराफत का तराजू लेकर।।
-'राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
    संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
    अध्यक्ष 'म.प्र. लेखक संघ         
    शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़ (म.प्र.)
भारत,पिन:472001 मोबाइल-9893520965
   
                               

शनिवार, 8 मार्च 2014

राजीव नामदेव 'राना लिधौरी क्षणिका-वे आम हो गये

व्यंग्य स्तम्भ-शर्म इनको मगर आती नहीं-13

क्षणिका- राजीव नामदेव 'राना लिधौरी क्षणिका-वे आम हो गयेवे आम हो गये

वे 'आम से खास हो गये,
खास होते ही कुर्सी के पास हो गये।
कुछ ज्यादा ही बेलगाम हो गये,
चन्द दिनों मे ही वे फिर धड़ाम हो गये।
उनके किस्से तमाम हा गये,
जनता के फिर से 'राम हो गये।।
     666666
-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
 अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़(म.प्र.)
भारत,पिन:472001 मोबाइल-9893520965

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राजीव नामदेव 'राना लिधौरी-विश्व 'महिला' दिवस पर कविता :-तुम हो एक नारी

विश्व 'महिला' दिवस पर विशेष-
   
  कविता :-तुम हो एक नारी
    तुम हो एक नारी,
    मत बनो तुम अंहकारी।
    तुम हो सबसे न्यारी,
    माने तुम्हें दुनिया सारी।
    तुम्हें पूजें जग सारा ,
    ऐसी ममता और त्याग कीे।
    तुम देवी बनो,
    यदि नहीं बन सको देवी ताें।
    तुम नित श्रद्धा के फ़ूल बनो,
    पति के गले का हार बनो।
    फूल बनकर सदा महकती रहो,
     जीवन की बगिया में,
     तुम सदा चहकती रहो,
       हर दिल में जगह बनाती रहो।
    ग़म सदा दूसरों के ,
    तुम यहाँ बाँटती रहो।
    666
      राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
      संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
      अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
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